दुनिया नियमों से संचालित होती है और अहसास कराती है कि सब कुछ निश्चितए गणितीय और गति मान है लेकिन यह भी सच है कि आकस्मि कताओं में भी बला की ताकत होती हैय वे कई बार समस्त आकलन ोंए निष्पत् तियोंए हमारे सपन ों और कार्य योजनाओं का चेहरा बदलकर रख देती हैं। दिल चस्प है कि व्यक् तिगत जीवन में आकस्मि क घटनाएं अच्छे बुरे दोनों तरह के नतीजे देने वाली होती हैंय अचानक एक क्षण में कि सी का जीवन अंधकार और विपत् तियों से घि र जाता है तो ऐसे भी दृष्टां त होते हैं कि यकायक कि सी की दुनिया का कायाकल्प हो उठता हैय उसके चारों ओर खुशीए रोशनीए उत्सा ह छा जाता है। मगर ठीक यही बात व्यक् ति से इतर समाज के बारे में ऐसे ही नहीं कही जा सकती। अमूमन देखा यही गया है कि कि सी समाजए देश या दुनिया पर जब आकस्मि कता के पैर पड़ते हैं तो अक्स र दुखांत ही प्रकट होता है। हां यह जरूर है कि व्यक् ति के ठि काने पर जहां वह सचमुच में अकस्मा त आ जाती हैए सामूहि क पटल पर वह अकस्मा त सी दि खती हुई भी वस्तु तः वैसी होती नहीं। वह अचानक प्रकट भले होती हो मगर अपन पन े आगमन की वजहें वह पहले से तैयार करती चलती है। इसीलिए सामाजि क दुर्घ टनाएं रोड एक्सि डेंट जैसी नहीं होती हैं कि राहगीर को पीछे से आते वाहन ने धक्का मारा और लीला खत्म । वे संकेत करती हैंए यह अलग है कि लोग उन संकेतों की अनदेखी करते हैं और भारी तबाही की चपेट में आ जाते हैं। आधा साल से अधि क का समय बीत चुका हैए हमारा देश बल्कि संसार कोरोना की महामारी से घि रा हुआ है। अगर हम चर्चा र्चा को अपन पन े देश तक सीमि मि त करें तो देखते हैं कि कोरोना की पदचापें पहले से सुनाई दे रही थीं कि ंतु तब हमारी सरकार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का अभि राम स्वा गत करने में दत्तचित्त थी और एक रोज अचानक बगैर कि सी तैयारी के लॉक डाउन लगा दि या गया। अर्था त जो एक सामाजि क संकट की प्रक् रिया थी उसे आकस्मि क विपत् ति की तरह प्रस्तु स्तुत कि या गया। क्य ोंकि यदि मुसीबत को प्रक् रिया में देखा जाता तो सत्ता की भूमि काए उसकी सफलता वि फलता की पड़ताल भी होती कि ंतु अगर उसे दैवीय विपत् ति की तरह बताओ तो सत्ता की जवाबदेही नहीं रह जाती। बहरहाल सत्ता की इस कारगुजारी का दुष्परिण ाम गरीब तबके को कि स कदर मर्मा न्त क की हद तक भूखए बेरोजगारीए अस्वास ्थ्य ए विस्थापन के रूप में भुगतना पड़ा इसे सबने देखा। दिल चस्प यह है कि अब जब कोरोना का कहर उतार पर लग रहा है तब हमारी सरकार
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कुछ इस भंगि मा में आ गयी है कि उसने इसको आकस्मि क विपत् ति नहीं प्रक् रिया के रूप में हमेशा समझा और समझाया और उसी के अनुसार मुकाबला कि या जि सका सुफल अब देखने को मिल रहा है। अतः अपन ी पीठ स्व यं थपथपाने का लाइसेंस उसको हासिल हो गया है। सत्ता के समानांतर जनता का पक्ष यह है कि जब मनुष्य के सम्मु ्मुख अस्ति त्व गत संकटए प्राण रक्षा ए की आ पड़ती है तो वह सत्ता की आलोचना से अधि क उससे मदद पाने से वास्ता रखता हैय इसी मनोदशा का लाभ मौजूदा निजाम उठाना चाहता है और उठा रहा है। वस्तु स्तुतः कोरोना का प्रहार बेहद ध्वं ्वंसकारी इसलिए भी रहा है क्य ोंकि इसने बाह्य और आंतरिक दोनों धरातलों पर हमें लहूलुहान कि या है और हमारी चूलें हिल ा दी हैं। एक ओर महंगाईए बेरोजगारीए घटती आय और क्षीण हुई क्र यशक् तिए विनष्ट अर्थ व्य वस्था जैसी भौति क और ठोस वस्तु स्तुगत समस्या एं हैं तो दूसरी ओर उसने संवेदनात्म क स्त र पर इन्सान को बुरी तरह तबाह कि या है। इतने महीनों से अनवरत मौत का खौफ लेकर जि न्दा ्दा रह रहे आदमी की मनोदशा का अंदाजा लगाना बि ल्कुल कठिन नहीं है क्य ोंकि प्रा यः हर कोई अपन ी चेतना की पीठ पर उस खौफ का बोझ लादे हुए है। उसके प्रभाव में इसलिए अधि क तीव्रता शामिल हो जाती है क्य ोंकि अब हम आसपास अपन े आत्म ी यों को कोरोना की गि रफ्त में आतेए संघर्ष करते और मरते हुए देख रहे हैं। यह भी सच है कि ज्या दातर कोरोना से लड़कर बच जा रहे हैं कि ंतु इस लड़ाई में यदि हालत बि गड़ गयी और अस्पताल की पन ाह में जाना पड़ा तो इलाज में जो आर्थि क नुकसान होता है और उस अवधि में भावनात्म क घमासान भीतर मचता है उसका भी आकलन कि या जाना चाहि ए। कहते हैं बीसवीं सदी मनुष्य और वि ज्ञान के पराक्र म तथा वि जय की सदी थी तो क्या इक्की सवीं सदी मनुष्य और वि ज्ञान के उस गौरव पर ग्रहण लगा देगीघ् उसके ताज में जो रत्न लगे हैं उनके छिन जाने का युग आ गया हैघ् जाहि र हैए इन सवालों के जवाब समय ही दे सकेगा फि र भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि मौजूदा सभ्य ता की गति ए आत्मवि श्वा सए व्याप् ति के रास्ते स्ते में अवरोधक उपस ्थि त हो गये हैं।
ऐसा माना जाता है कि जब समाज में यथार्थ असह्य हो जाता है और उससे मुक् ति का कोई ठोसए सुनिश्चित उपाय नहीं दि खाई देता है तब समाज साहि त्य और कला में अपन ी पन ाह ढूंढ़ता है। क्य ोंकि ये माध्य म पीड़ाग्रस्त समुदायों का मनबहलाव करते हैं और उनके यथार्थ र्थ के अनदेखे अनसुलझे पहलुओंए सत्य ों से साक्षा क्षा त्का ्का र भी कराते हैं और कई बार मुक् तिमार्ग र्ग भी प्रस्तु स्तु स्तुत करते हैं अथवा कम से कम मुक् ति के प्रति ति भरोसे और जि ंदगी में आस्था का राग तो सुनाते ही हैं। मगर दि क्क त यह है कि आजादी के आंदोलन से अब तक हमारी चेतस रचनाशीलता का जो अभ्या स रहा है वह संकट और उसके प्रति रोध के सामूहि हि क स्व स्व रूप को अभि भि व्यक् ्यक् ति देने का रहा है। स्वा स्वा स्वा तंत्र्योत्त र्योत्त र परिदृश्य पर नजर डालें तो भारत वि भाजनए आपातकालए 84 के दंगेए भूमंडलीकरणए साम् प्रदायि क दंगे सभी के उत्स ए प्रसारए प्रभाव और निदान को हमने उनके सामाजि क परिप्रे िप्रेक्ष्य में देखाय निश्च य ही इस प्रक् रिया में वि चारधारा हमारी राह को आसान बनाती रही लेकिन किन किन इस बार फर्क स्थिति थिति है।
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कोरोना ने हमारी सामूहि कता की अवधारणा को कमजोर कि या हैय लोग अपन ीए अथवा अधि क से अधि क अपन े परिवार कीए हि फाजत से सरोकार रख रहे हैं। अन्य की सुरक्षा महज इसलिए महत्वप ूर्ण है क्य ोंकि अन्य के असंक्रमि त रहने में अपन े को रक्षि त रखने की गुंजाइश बढ़ जाती है। यही बात प्रति रोध के संदर्भ में हैए अबकी मुकाबला ऐसे दुश्मन से है जो अदृश्य हैय वह वर्ग ए वर्ण ए सत्ता धारी आदि कुछ भी नहीं है। वह कोई समूह अथवा तंत्र या व्य वस्था नहीं है जि ससे हम एकजुट होकर टकरा जाएं और उसे परास्त कर दें। यहां तो दूर दूरए अलग थलग रहने में ही भलाई निहि त है। हाथ पर हाथ धरे अचूक वैक्सीन आ जाने या हर्ड इम्यु निटी वि कसि त होने या कि सी चमत्का र का इंतजार करना है। यह अत्यं त असहज करने वाली बात है कि कोरोना ने मनुष्य द्वा रा सामूहि क मुक् ति और खुशहाली के स्व स्व प्न देखे जाने की महान परम्परा पर दुर्ध र्धर्ष आघात कि या है। शायद यथार्थ र्थ की यह नयी जटिल चारित्रि कता ही वजह हो कि कोरोना को लेकर बृहद स्त र परए कम से कम गद्य मेंए अपेक्षि त रचनाकर्म नहीं हो सका है। कवि ताएं जरूर कुछ सामने आयी हैं लेकिन उनमें से अधि कतर संश् लिष्ट ता में प्रवेश न करके भावुक अथवा प्रा रम्भि क प्रतिक् रियाएं सरीखी हैं। लेकिन यह कि सी भाषा की सामर्थ ्य पर प्रश्नचि ह्न लगाना नहीं है क्य ोंकि समय की युगांतरकारी घटनाओं पर उच्च साहित्यि क स्त र का कृति त्व प्रा यः वक्त के एक अंतराल की अपेक्षा करता है ताकि तात्काल िक वि वरणों और फौरी भावावेगों से अपन ी सृजनात्म क तटस्थ ता अर्जि त की जा सके।
आवश्य क नहीं कि कि सी दुर्दिन पर आधारित रचना ही उस दुर्दिन से जूझने के लिए शरण और शक् ति दे। भि न्न समस्या ए भावबोधए परिवेश यहां तक कि अलग कालखंड में रची गयी कृति मौजूदा मुसीबत से भि ड़ने में हमारी मि त्र बन सकती है। कठिन ाई यह है कि कोरोना काल में इस रास्ते स्ते में भी तरह तरह के गति अवरोधक हैं। कि ताबों के संसार पर बात की जाय रू हि ंदी साहि त्य की पुस्त कों की बिक्री और प्रसार अमूमन बुक शॉपए ऑन लाइन बिक्री ए सरकारी संस्था ओं और शि क्षण संस्थान ों के लिए खरीदए पुस्त क मेलों आदि के माध्य म से हो रहा थाय कोरोना के कारण पुस्त क मेले आयोजि त नहीं कि ये जा सकतेए बुक शॉप तक जाने में कोरोना के भय के कारण लोग हि चकते हैंए स् स् कूल कॉलेज वि ण्वि ण् बंद चल रहे हैंए सरकारी खरीद के लिए फंड नहीं है। अतः थोड़ी बहुत गुंजाइश ऑन लाइन खरीद से ही मुमकिन हो रही है। वह भी ज्या दा नहीं क्य ोंकि कोरोना काल में साधारण आदमी की आमदनी में तीव्र गि रावट आयी है। नतीजतन प्रकाशनगृहों से कि ताबें बेहद कम प्रकाशि त हो रही हैंय यदि छपती भी हैं तो उनकी प्रसार संख्या में कमी हुई है। ऐसे में लेखकों की रॉयल्टी घटी है। कमोबेश ऐसे ही या इससे अधि क चुनौतीपूर्ण हालात साहित्यि क पत्रि काओं के हुए हैं। उनकी प्रसार संख्या ए प्रकाशनए नैरंतर्यए संसाधनए वि तरणए पठन पाठन सभी कुछ समस्या स्या स्या ग्रस्त स्त हुए हैं। जाहि हि र है इस तरह के माहौल में नया रचने के उत्सा ह भी मंद पड़ जाता है। नया लिखने के प्रसंग में एक तथ्य यह भी कि सभी जानते हैंए लेखन एक नितांत निजी क् रिया होने के बावजूद उसके लिए लेखक का समाज से साक्षा त्का र
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जरूरी है। एक लेखक को लिखने को जीवंत और सार्थ क बनाने के लिए अपन े अनुभव तथा संवेदन का विस्ता विस्ता र करना होता है जो बगैर समाज में धंसे और गति ति शील हुए सम्भ व नहीं हो पाता। कोरोना लेखन की उक्त बुनियादी आवश्य कता को पूरी नहीं होने दे रहा है। वह फरमान सुनाता है कि समाज में भ्रमण मत करोए लोगों से मिल ोजुलो मत। इस प्रकार यथार्थ सेए दृश्य ों सेए बि म्ब ों सेए वि चारों और वि चारधारा से कई गज की दूरी बनाकर रखो।
आखि र लेखकए पाठकए साहि त्यान ुरागी क्या करेंघ् वक्त बदलन े कीए पहले के दिन ों की वापसी कीए सब कुछ सामान्य होने की प्रतीक्षा करेंघ् वे प्रतीक्षा करने का धैर्य दि खाते भी हैं तो सवाल हैए क्या मार्च 2020 के पूर्व का वक्त वापसी करेगाघ् इसका उत्त र निश्च यपूर्व क नहीं दि या जा सकताय हां एक अन्य जि ज्ञा सा जरूर की जा सकती है रू मान लेने में हर्ज नहीं है कि इति हास में मानव सभ्य ता ने अनेक अपराजेय लगते संकटों पर फतेह पायी हैए इस बार कोरोना भी पराजि त होगा और हम वर्त मान दुरूस्व प्न से निजात पाकर बेहतर भवि ष्य का तानाबाना फि र से बुनन ा शुरू कर सकेंगेय लेकिन क्या वाकई समाज की तस्वी र वैसी ही रहेगी जैसी कोरोना पूर्व थीघ् हमारे साहि त्य के मुद्रणए वि तरणए वि चार वि निमय के मंचए अभि व्यक् ति के माध्य म कम ज्या दा परिवर्ति त हो जायेंगेघ् यदि ऐसे बदलाव होते हैं तो क्या हमारे साहि त्य की अंतर्वस्तु र्वस्तुए विष यए वि चारए मुद्दे भी थोड़े बदले बदले से नहीं होंगेघ् इन सब पर वि मर्श र्श बेहद जरूरी है लेकिन किन बहरहाल अभी तो दो ही भाव प्रमुखतः व्याप्त ्याप्त हैं रू कोरोना महामारी के वि दा होने की आस और उसके अधि क मारक हो जाने का खौफ।
डरए उदासी और निष्क् ष्क् रियता के वि गत कुछ महीनों में हमने अपन पन ी अनेक साहित्यि हित्यि हित्यि हित्यि क वि भूति ति यों को खो देने की क्षति उठायी है। कथा साहि त्य के अनेक श्रेष्ठ रचनाकार इस अवधि में हमारे बीच से चले गए। गि रिराज कि शोरए कृष्ण बलदेव वैदए गंगा प्रसाद वि मलए स्व यं प्रकाशए श्र वण कुमार गोस्वा मीए सुषम बेदीए युवा प्रे प्रेम भारद्वा जए शशि भूषण द्वि वेदी का साल भर के भीतर निधन ऐसी असाधारण क्षति है जि सकी भरपाई असम्भ व है। कवि वि ष्णु ्णु चन् द्र शर्मा का दि वंगत होना वस्तु तः एक युग का अवसान कहा जायेगा। खगेन् द्र ठाकुर और नंद कि शोर नवल का गुजरना हि ंदी आलोचना में एक बड़ा खालीपन पैदा करता है। वीरेंद्र कुमार बरनवाल और देवी प्रसाद त्रिप ाठी का निधन भी हमारे साहित्यि क परिवेश की असहनीय घटना है। दोनों ही लेखकए वि द्वान और साहित्यि क सक् रियताओं को प्रो त्सा हन देने वाले व्यक् तित्व थे। पूर् वोक्त सभी की स्मृति को तद्भव की तरफ से सादर नमन।

 

अखिलेश