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जब तद्भव का प्रकाशन शुरू हुआ तो न हमारी महत्वाकांक्षा थी न हमारे कर्म इस कोटि के थे फिर भी संयोग माना जाये कि तद्भव को पाठकांे, बौद्धिकों, लेखकों का जो अपनापन मिला वह चकित करने वाला था। दिनोंदिन इसमें रुचि लेने वालों की बिरादरी बढ़ती जा रही है। लेकिन इस सुखद स्थिति से एक समस्या भी हुई है कि आये दिन पुराने अंकों की मांग बढ़ रही है। जबकि हमारे पास किसी अंक की प्रतियां उपलब्ध नहीं हैं। कुछ अंकों की रेकार्ड प्रति भी शेष नहीं है। कई लोगों ने हमारी विवशता को समझा और पुराने अंकों के पुनर्प्रकाशन का मशविरा दिया जो हमारी सामर्थ्य और सीमा को देखते हुए मुमकिन न था। किसी ने कोई अंक न भेज पाने की दशा में उस अंक की रचनाविशेष की जरूरत बतायी तो हमने उसकी छाया प्रति प्रेषित की। किन्तु बाद में यह एक अंतहीन और थका देने वाला सिलसिला लगने लगा। बस इसी बिन्दु पर विचार जन्मा कि तद्भव के अब तक प्रकाशित अंकों से चुनी गयी महत्वपूर्ण रचनाओं का चयन छाप कर, पूरी तरह न सही, अंशतः लोगों की अपेक्षाएं पूरी की जायें। हमने अपनी योजना के बारे में मित्रों से राय ली। उनके उत्साह ने हमें इस अंक के बारे में निर्णय लेने की दिशा में मजबूत किया। निश्चय ही क्रियान्वयन हेतु पच्चीसवें अंक को निभित्त बनाना अधिक श्रेयस्कर लगा। क्योंकि बहाना ही सही, किन्तु ‘रजत जयंती अंक’ पद से कुछ अधिक भार, प्रासंगिकता और जश्न का भ्रम निर्मित होता ही है।

अंक को चेहरा देने के लिए काम प्रारम्भ होने पर मालूम हुआ कि बहुत सरल लगने वाला यह काम आसान नहीं है। हमने शुरुआत यूं की: अनेक ऐसे रचनाकार, पाठक, विद्वान हैं जो प्रवेशांक से लेकर अद्यतन तद्भव की रचनाओं पर सजग और समग्र दृष्टि रखे हुए हैं, उनमें से कुछ लोगों से हमने तद्भव के चौबीस अंकों की बेहतरीन सामग्री पर उनकी अपनी पसंद बताने के लिए आग्रह किया। इस पर जो नतीजा सामने आया वह हमारी हिम्मत पस्त कर देने वाला थाµ लगभग ढाई हजार पृष्ठों की सामग्री बन रही थी। जिसका एक अंक में प्रकाशन असम्भव था। हमने पेंच कसेµ ;पद्ध एक लेखक की एक ही रचना होगी ;पपद्ध समीक्षाएं नहीं शामिल की जायेंगी क्योंकि वे नयी पुस्तकों पर केन्द्रित होती हैं, अब वे पुस्तकें नयी नहीं हैं। पपपद्ध इसी तर्क से समसामायिक टिप्पणियां आदि भी छोड़ दी जायें। परंतु अब भी हमारे पास डेढ़ हजार पृष्ठों की सामग्री थी, और सवाल था कि क्या करें? आखिरकार बिल्कुल न चाहते हुए भी लघु उपन्यासों को इस दलील से छोड़ा कि वे पुस्तकाकार स्वतंत्रा रूप से शाया हो चुके हैं और उनका कोई अंश प्रकाशित करने से बात बनती नहीं। निश्चय ही यह निर्णय काफी अनिच्छा से लेना पड़ा। हमारी सामर्थ्य होती तो इस अंक में ममता कालिया का दौड़, मैत्रोयी पुष्पा का विजन, श्रीलाल शुक्ल का राग विराग, शिवमूर्ति का तर्पण, रवीन्द्र कालिया का ए.बी.सी.डी., काशीनाथ सिंह का रेहन पर रग्घू, रवीन्द्र वर्मा का आखिरी मंजिल जैसे उपन्यास अवश्य होते। इस अंक में उपरोक्त कृतियां उपलब्ध न करा पाने का हमें वाकई गहरा खेद है। फिलहाल हम यही निवेदन करते हैं कि इस अंक को उक्त कृतियों के साथ ग्रहण किया जाये। इसी प्रकार हबीब तनवीर की रचना विलायत के वाकये और महाश्वेता देवी की एक ही जीवन में को भी शामिल माना जाये। ये मूल रूप से हिन्दी में नहीं लिखी गयी थीं। यह हमारा सौभाग्य था कि इनका पहले पहल प्रकाशन अपनी मूल भाषा की पत्रिका में न होकर तद्भव में सम्भव हुआ था। अब जो स्वरूप बना, उसके आधार पर हमने कुछ महत्वपूर्ण लेखकों से अनुरोध किया कि इसमें से वे अधिक श्रेष्ठ रचनाओं का चुनाव करें। और अंत में उनकी मिली जुली राय के आधार पर जो चीज तैयार हुई वह आपके सामने है।

 

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