आज के दौर का मुख्य चरित्रा व्याख्यायित करने की प्रक्रिया में अक्सर कहा सुना जाता है कि हम एक आभासी समय में रह रहे हैं; जैसे कि नब्बे के दशक में, खास तौर पर साहित्य में, बार बार लिखा पढ़ा कहा सुना जाता था कि यह हिंò समय है अथवा हम कठिन समय में जी रहे हैं! यूं देखा जाए तो आज का वक्त भी कम हिंò और कठिन नहीं है और पहले, बहुत पहले भी, कमोबेश एक अपनी तरह के आभासी संसार की नजीरें थीं। आखिर स्वर्ग नरक को किसने देखा, अनुभव किया। कहा जा सकता है, स्वर्ग नरक समय और संसार के पार की अवधारणाएं या परिकल्पनाएं हैं जिनमें जीते जी होने वाले आभास का मसला शामिल नहीं होता है। लेकिन भूत प्रेत, आत्माओं के किस्से कारनामे पहले बहुत ज्यादा सुनने में आते थे और बेशक ये यथार्थ नहीं, आभास होते हैं; एक मानसिक विक्षेप। कुछ लोगों के बयान पर यकीन किया जाए तो कहा जा सकता है कि काला जादू, वशीकरण आदि के माध्यम से भी एक आभासी संसार की रचना की जाती है जिसकी गिरफ्त में फंसा इंसान वही अनुभूत करता है जो उसको कराया जाता है। स्वप्न भी एक आभासी लोक है जो हमेशा मनुष्य के जीवन में मौजूद रहा है और जहां सब कुछ प्रत्यक्ष सरीखा सत्य महसूस होता है जबकि वास्तव में उसका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। बातें यहीं नहीं थमतीं, इस सिक्के का सकारात्मक पक्ष भी है: लेखक कवि, संगीतकार, कलाकार भी एक आभासी सृष्टि में अपने रसज्ञ को प्रवेश कराते हैं; वह ऐसे लोक में विचरण करने लगता है जो हकीकत में ठीक वैसा है ही नहीं।
कहना यह है कि मनुष्य और आभासी संसार का संबंध अप्रत्याशित और एकदम नया नहीं है; वह कमोबेश पहले था और अद्यतन मौजूद है। निश्चय ही इस रिश्ते के कुछ उज्ज्वल हिस्से हैं तो कुछ कमोबेश दागी भी हैं। दरअसल आभासी संसार भी अलग अलग असर पैदा करते हैं। वह आभासी संसार हमारे समाज को विषाक्त करता है जो हमें वास्तविकता, तर्क, विज्ञान और जिंदगी के सत्य की चेतना से भ्रमित करता है जबकि साहित्य और कलाओं के आभासी जगत इन पूर्वोक्त सुंदर चीजों में हमारे विश्वास को मजबूत बनाते हैं। वे ऐसा कर सकने में इसलिए सक्षम होते हैं क्योंकि वे इनके विरुद्ध होने के बजाय इनके साथ और इनके सामानांतर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। मगर हम जिस वर्तमान में रह रहे हैं उसमें यथार्थाभास से चार कदम आगे बढ़कर मिथ्याभास का ध्वज फहर रहा है। आज एक आदमी कुछ भी उत्पादक नहीं करता है लेकिन वह यह अवधारणा बनाने में निपुण है कि वह समाज देश की भलाई के लिए अथक मेहनत कर रहा है; इसके आधार पर वह बेतहाशा राजनीतिक, सामाजिक लाभ कमाता है। छद्म आभास या अहसास पैदा करने की विद्या के बल पर एक राजनेता जिस पर राज्य केंद्रित जनसंहार के आरोप लगे हैं वह शांति के पुरस्कार का दावेदार बन जाता है। एक विचारधारा और संगठन जिसकी निर्मिति नस्ली, लैंगिक और वर्ण घृणा पर आधारित है वह स्वयं को करुणा, सद्भाव और प्रेम के अग्रदूत के रूप में प्रचारित कर रही है। समस्या तब ज्यादा विकट हो जाती है जब हम पाते हैं कि एक बड़ा जनसमूह उनके मिथ्या निर्माण को वास्तविक मानकर उनको अपना समर्थन प्रदान कर रहा है।
तकनीक, संचार, इंटरनेट, सोशल मीडिया के करिश्मे ने लोगों को इस तरह गढ़ा है कि लोग अपने इंद्रियबोध का इस्तेमाल कम से कम करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। या कहें कि अपने आसपास के चराचर जगत से लोगों का संपर्क इंद्रियबोध के स्तर पर कम और इल्मी अधिक हो रहा है। नतीजतन हम इस दुनिया और उसकी वस्तुओं को उसकी लिखित, मान्य विशेषताओं के आधार पर जानने लगे हैं न कि अपने इंद्रियबोध के आधार पर। अतः खतरा यह दरपेश है कि सत्ताकेंद्र यदि लोकतांत्रिक मूल्यों की अवमानना करने को लेकर निर्लज्ज हो जाए तो वह देश की संस्थाओं, मीडिया, सोशल मीडिया आदि पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष नियंत्राण बनाकर अपने गुणगान के आंकड़े, तथ्य, आख्यान आदि को सूचना एवं ज्ञान के रूप में परोस सकता है। हमारे देश का दुर्भाग्य यह है, विगत कुछ वर्षों से हम राजसत्ता की इस कारगुजारी को लगातार घटित होता देख झेल रहे हैं। इंद्रियबोध से पार्थक्य की उपरोक्त प्रवृत्ति का सामाजिक स्तर पर अन्य दुष्परिणाम यह होना है कि एक रोज हम एक वृक्ष से महज उसकी वानस्पतिकी के जरिये परिचित होंगे; हम उसे उसकी छांह, उसकी हरियाली, उसकी गंध, उसकी छाल, उसकी पत्तियों के संगीत और डालों टहनियों के हिलने और तने के अडिग रहने से नहीं जानेंगे; हम उसे उसके फलों, गिलहरियों, कोटरों, घोसलों और चिड़ियों की चहचहाहट के साथ नहीं जानेंगे। जाहिर है, यह स्पष्ट करने की जरूरत नहीं कि यह विडंबना केवल पेड़ों के प्रसंग तक ही सीमित नहीं रहनी है। इस तरह चल पड़ा है वह रिवाज जिसमें रिश्ते होते हैं मगर उनका ठोस साहचर्य अनुपस्थित रहता है। दिमाग रहता है प्रज्ञा नहीं, सूचनाएं हैं ज्ञान नहीं, तर्क है विचार नहीं। इस प्रकार के माहौल में भी सत्ताकेंद्रों द्वारा अपने मनचाहे विचारों, छवियों, मान्यताओं को आमजन के बीच स्थापित करा ले जाना सरल होता है। क्योंकि आभासी विश्व के चलते साधारण आदमी प्रायः अराजनीतिक, गैर वैचारिक और सामाजिक रूप से निष्क्रिय होने की दिशा में अग्रसर है। ऐसा होने के पीछे यह वजह भी है कि यथार्थ के इंद्रियबोध से दूर होने के फलस्वरूप जन सामान्य का विवेक और उसकी चेतना सही गलत पर रोशनी डालने की जिम्मेदारी निबाहने में शिथिलता बरतने लगती है। आखिर विवेक अथवा चेतना के निर्माण में भी तो हमारे इंद्रियबोध से प्राप्त और संचित अनुभवों की नियामक भूमिका रहती है। इस पूरी परिस्थिति का सर्वाधिक फायदा विगत कुछ वर्षों से कट्टर पुनरुत्थानवादी दक्षिणपंथी शक्तियां उठा रही हैं। अगर 2014 में हुए लोकसभा के आम चुनाव का स्मरण किया जाय तो याद आ जाता है कि भाजपा के प्रधानमंत्राी पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान ने जबरदस्त तरीके से आभासी वातावरण तैयार किया था। तकनीकी श्रेष्ठता, आर्थिक बहुतायत और गल्प को भी सत्य से ज्यादा आत्मविश्वास से कहने की ताकत ने जो मरीचिका रची थी उससे जनता का बड़ा हिस्सा विस्मित और वशीकृत हो गया था। संघ, भाजपा और प्रधानमंत्राी के लिए यह एक रामबाण नुस्खा था जिसे उन्होंने विगत साढ़े चार वर्षों में लगातार बार बार आजमाया है। मगर नित्य की जो प्रत्यक्ष मार पड़ती है वह मजबूत से मजबूत माया सृष्टि की वास्तविकता को अंततः उजागर कर देती है इस बात को समझने में बौद्धिक भले कोताही बरतते हों, सत्ताकेंदों ने इसको समझने में बिलकुल विलंब नहीं किया। अतः उनने एक माया के जीर्ण पड़ने के पहले ही उसी कुल के दूसरे औजारों का इस्तेमाल किया। आज के समय में गिनेचुने महानुभावों के आलावा शेष देश की यातना ऐसी ठोस, अटल, अकाट्य, असह्य हो गयी है कि उसको वर्तमान के विभ्रम तथा भावी की मिठाई से बहलाया फुसलाया नहीं जा सकता; अतः हमारे सामाजिक जीवन के चतुर्दिक अतीत के जीर्णोद्धार और पुनरुत्थानवाद की माया रची जा रही है। हमें एक ऐसे समय में धकेला जा रहा है या हमको ऐसे समय में रहने की अनुभूति कराई जा रही है जो किसी भी रूप में हमारे आसपास नहीं है न कभी हो सकता है क्योंकि दूर स्वर्णिम अतीत का आभास भले कराया जाए उसे लौटाया नहीं जा सकता। गाय, गीता, गंगा आदि के लिए व्यक्त किया गया, पैदा किया गया क्रूर अनुराग, जुनून सरीखी गतिविधियां उक्त परियोजना के हिस्से हैं। सवाल है, अगर गोरक्षा आंदोलन के पीछे अहिंसा और पशुप्रेम की भावना काम कर रही है तो अन्य पशुओं ने क्या अपराध किया है? फिर आप शाकाहार के अनुयायी क्यों नहीं हो जा रहे हैं? इसी तरह जब गंगा के लिए प्रेम प्रकट किया जाता है तो वजह यह नहीं होती कि नदियां जो सभ्यता की वाहक, प्राणियों की पोषक, प्रकृति की महान सौगात रही हैं उनके संरक्षण का जज्बा हिलोरें मारने लगा है या गीता के महात्म्य बखान की पृष्ठभूमि में उन दार्शनिक अर्थों की प्रेरणा रहती है जिन्होंने तिलक, गांधी जैसे व्यक्तित्वों पर अपने अपने ढंग से असर डाला था। लेकिन यहां समस्या यह है कि उद्देश्य पर्यावरण, अहिंसा, पठन पाठन तो है नहीं बल्कि उस समकालीन चेतना का अपहरण है जो मौजूदा मुश्किलों की वजहों की व्याख्या करती है और उसकी जिम्मेदार ताकतों की और उंगली उठाती है। दरअसल किसी भी विचार या कर्म के वाजिब होने की बुनियादी कसौटी है, उसके पीछे प्रेम की भावना हो, एक प्रेम से भरी दुनिया का स्वप्न हो लेकिन हमारे देश में बीसवी सदी के आखिरी दशक से पुनरुत्थानवाद का जो प्रचंड धारावाहिक चल रहा है उसमें इस सपने का रत्ती भर अंश नहीं है। वहां प्रबल घृणा है जो मुसलमान, वामपंथियों सहित समस्त असहमतों को संबोधित है।
प्रारंभ में नवें दशक में लोकप्रिय पद ‘हिंò समय’ और ‘कठिन समय’ का जिक्र हुआ है; अब आखिर में हम कहना चाहते हैं, इस नजरिये से भी यह बदतर वक्त है। खास तौर पर हाशिये के समाजों के लिए यह अधिक क्रूरतापूर्ण है। हिंसा क्या है? जब किसी बेगुनाह को सताया जाता है तो वह हिंसा है। आज हालत ये हैं कि किसान, मजदूर, स्त्रिायां, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि समुदाय विभिन्न प्रकार के हिंसा रूपों से घिरे हैं। इतना ही नहीं, हमारी अनेकता में एकता की संस्कृति, विचारों का लोकतंत्रा, असहमति के अधिकार की परंपरा, साहित्य, कलाएं, पर्यावरण, संविधान सभी एक तरह के हिंसक आचरण की चपेट में हैं। इसी तरह मामूली आदमी, वह आदमी जिसके पास लूट और भ्रष्टाचार की संपत्ति नहीं है, का जीवन लगातार कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। सर्वज्ञात तथ्य है, अब बेहतर किस्म की शिक्षा, आवास, भोजन, स्वास्थ्य, पालन पोषण, संरक्षित भविष्य सामान्य नागरिक के लिए असंभव हो चुका है। असलियत में यह समय एक साथ आभासी, कठिन और हिंò है। यह ज्यादा मुश्किल और चुनौती भरा इसलिए भी है कि अब साबका ऐसी सत्ता संरचना से है जो मायाजाल रचने में बड़ी दक्ष है। कभी वह भविष्य को स्वर्णयुग बनाने का वादा करती है तो कभी अतीत के स्वर्णयुग की खोल में पनाह लेती है। जबकि निहत्था, असहाय, संकटग्रस्त वर्तमानदृ लहूलुहान समकालदृ हमारे सामने है।

आपको यह बताते हुए हमें खुशी हो रही है कि तद्भव की वेबसाइट जो कुछ तकनीकी कारणों से पिछले कुछ समय से स्थगित थी, अब पुनः पाठकों के लिए उपलब्ध है।

बीते दिनों में हिंदी कविता के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि विष्णु खरे का निधन हो गया जो बहुत तकलीफदेह है; वह स्वयं में कविता के एक संस्थान थे। दूसरी तरफ गीत परंपरा की सबसे बड़ी प्रतिभा गोपाल दास नीरज भी दिवंगत हो गए। उन्होंने कविता के इलाके में लोकप्रियता के शीर्ष को जिस तरह छू लिया वैसा हरिवंश राय बच्चन के बाद अन्य किसी के हिस्से में नहीं है। महत्वपूर्ण कवि सुरेश सेन निशांत का गुजर जाना भी स्तब्ध करने वाला है। अच्छी कविताएं लिखने के साथ साथ वह हिमाचल प्रदेश में साहित्यिक सव्रि$यता की धुरी भी थे। कथा साहित्य में भी बहुत बड़ी क्षति हुई है: अनेक उत्कृष्ट उपन्यासों, कहानियों के रचनाकार तेजिंदर हमारे बीच नहीं रहे। अपने लेखन को लेकर उनकी कई भावी योजनाएं थीं। भारतीय भाषाओं के दो शीर्षस्थ रचनाकार महाश्वेता देवी और काजी अब्दुल सत्तार की मृत्यु निश्चय ही ऐसी अपूरणीय क्षति है जिसको भर सकना कठिन होगा। वरिष्ठ पत्राकार, लेखक राजकिशोर का जाना भी हतप्रभ का देने वाला है। इन समस्त विभूतियों को तद्भव की विनम्र श्रद्धांजलि!

 

अखिलेश