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देश के राजनीतिक सांस्कृतिक क्षेत्रा में जो परिदृश्य उपस्थित है और कमोबेश उसको जनमत का जो समर्थन प्राप्त हुआ है उसे देखते हुए प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, वामपंथी शक्तियों के मध्य एक तरह की निराशा, हताशा, क्या करें क्या न करें वाली अनिश्चयता की घेरेबंदी बहुत अस्वाभाविक नहीं है। ऐसा निस्तेज आजादी के बाद शायद पहली बार घटित हो रहा है। दूसरी और यह भी पहली बार हो रहा है कि सत्ता की खुराक पाकर दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक ताकतें बेतरह उन्माद, अहंकार, हिंसा से बेलगाम भरी हुई हैं। बेशक इनका प्रतिकार होगा। जनता, मानवाधिकार और सौहार्द को समर्पित संस्थाएं, भारत की बहुल संस्कृति में भरोसा रखने वाले राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया सोशल मीडिया का एक तबका निश्चय ही देर सबेर संघर्षशील प्रतिपक्ष की भूमिका निबाहेगा। दरअसल वर्तमान में चिंता अधिक गंभीर तथा मारक इसलिए हो गई है कि सामान्य जन का एक खासा बड़ा हिस्सा राजनीति, संस्कृति, वैचारिकी के मोर्चे पर अनुदार और मनुष्यताविरोधी सत्ता को समर्थन देता दिखाई देता है। जब लगभग तीन वर्ष पहले केंद्र में भाजपा सरकार आरूढ़ हुई तो उसकी एक मीमांसा यह हुई कि पूंजी, प्रचार, संगठन, असत्य के सहारे उसने विजय पाई और जनमत एक कपटी किंतु विशाल मायाजाल का शिकार हुआ। दिल्ली एवं बिहार के विधानसभा चुनावों के भिन्न परिणामों ने सचमुच इस विश्लेषण को मजबूत किया कि 2014 का नतीजा एक दुःस्वप्न था जो अब टूट रहा है। इस ख्याल में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव निर्णायक मोड़ सिद्ध हो सकता था मगर इसमें भाजपा की धुआंधार फतेह ने भयानक पलटवार कर दिया। अब स्थिति यह है कि एक भीषण सदमा है, जिससे उबरने की ठोस सूरत फिलहाल नजर नहीं आ रही है। संकट तब अधिक गहरा जाता है जब हम वैश्विक धरातल पर निगाह डालते हैं। अनेक विकसित, आधुनिक, संपन्न देश भी राष्ट्रवाद की गिरफ्त में हैं और अन्य के लिए असहिष्णु हैं; उनकी इस समझ को वहां के लोगों का पर्याप्त उल्लेखनीय तबका समर्थन भी दे रहा है। बहरहाल हम अपनी बात अपने ही देश तक सीमित रख रहे हैं। यहां तो हम देख ही रहे हैं कि विगत कुछ समय से असहिष्णुता की प्रवृत्ति तेज हुई है जिसका प्रतिफलन चुनाव परिणामों और भावी राजनीतिक परिदृश्य को लेकर किये जा रहे आकलनों में हो रहा है। कहना यह है कि लड़ाई मुश्किल इसलिए लग रही है क्योंकि राजनीतिक सत्ता से संघर्ष किया जा सकता है किंतु अपने ही लोगों, देश के लोगों के भीतर पैठ बना चुकी असहिष्णुता से लड़ना और उसे समाप्त करना वाकई बहुत कठिन, दीर्घगामी और पीड़ादायक है।
समस्या की जटिलता को समझने के लिए एक सर्वेक्षण का संदर्भ लेते हैं। पिछले वर्ष सेंटर फॉर द स्टडी इन डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) और जर्मन संस्था केएस द्वारा युवाओं को लेकर कराए गए एक सर्वेक्षण के परिणाम अभी जल्दी ही सार्वजानिक हुए हैं जिनसे कुछ अप्रत्याशित और विचारणीय तथ्य सामने आते हैं। विशेष रूप से तब जब सीएसडीएस द्वारा 2009 और 2014 में कराए गए इसी प्रकार के सर्वेक्षण के नतीजों से इसकी तुलना की जाए। सदियों से दुनिया भर में इस अवधारणा पर भरोसा जताया जाता रहा है कि युवा वर्ग रूढ़ियों, जड़ताओं, व्यवस्था के खिलाफ रहता है। न केवल इतना बल्कि वह विद्रोह, आधुनिकता, नवाचार, परिवर्तन का अग्रदूत होता है। उसका साहसपुंज पश्चगामिता, पोंगापंथ का ध्वंस करता है। इसकी टक्कर से अनेक सत्ताएं शक्तिकेंद्र तबाह हुए हैं। लेकिन उपरोक्त सर्वेक्षण के तथ्य भूमंडलीकरण में युवा हुई पीढ़ी के विषय में दूसरी कथा कह रहे हैं। वे इस खतरे की घंटी बजा रहे हैं कि देश का युवा अपने दिमाग में अग्रगामी के बजाय पुरातनपंथी विचारों को ज्यादा गले लगा रहा है। 18 साल की अवस्था में एक नौजवान में व्यवस्था के प्रति गुस्सा और उसको बदल डालने की आकांक्षा का होना उसके युवापन का जरूरी लक्षण है। कह सकते हैं, बगावत और इश्क यौवन का सबसे जरूरी चिद्द है किंतु आज 18 से 25 वर्ष तक के 79 प्रतिशत युवाओं की सबसे बड़ी समस्या नौकरी है।
यहां तक गनीमत थी; 67 फीसदी युवा लिव इन रिलेशनशिप को सही नहीं मानते और  40 प्रतिशत तो वैलेंटाइन डे के खिलाफ हैं। आगे स्त्राी को लेकर क्या विचार हैं, देखिए: 51 प्रतिशत युवा इस मत के हैं कि पत्नी को हमेशा अपने पति की सुननी चाहिए और 65 फीसदी अपनी पत्नी के साथ रहने की तुलना में अभिभावकों के साथ रहना अधिक पसंद करते हैं। 41 फीसदी का मानना है, विवाहित महिलाओं को नौकरी नहीं करनी चाहिए। प्रायः ऐसा माना जाता रहा है जोकि उचित ही है कि ईश्वर के अस्तित्व को सर्वाधिक चुनौती युवा वर्ग से मिलती रही है। नास्तिकता भी विद्रोही मिजाज का एक स्वाभाविक लक्षण है लेकिन बकौल सर्वेक्षण 2016 में 79 प्रतिशत युवा ईश्वरवादी होने के साथ साथ बाकायदा प्रार्थना में विश्वास करते हैं जिनमें करीब 65 प्रतिशत प्रार्थना स्थलों में जाते हैं। बताते चलें कि 2009 के 52 फीसदी की तुलना में आज 13 प्रतिशत ज्यादा युवा पूजागृहों में जा रहे हैं। 27 प्रतिशत इस तरह के भी हैं जो पड़ोसी के यहां मांसाहारी भोजन बनने पर असहज महसूस करते हैं। दिलचस्प है कि 60 फीसदी युवा फैशनेबल कपड़ों और मोबाइल का शौकीन है। आखिर में यह कि सर्वे में एक राजनीतिक पार्टी के रूप में युवाओं का सबसे ज्यादा झुकाव भाजपा की तरफ दिखा।
आखिर भूमंडलीकरण ने ये कैसी आधुनिकता का निर्माण किया है जिसमें नवाचार केवल बहिर्मुखी है। ये कैसा खूंखार प्रहसन और पाखंड है कि हम नुमाइश होने वाली चीजों में नएपन को अपना रहे हैं लेकिन विचारों और भावनाओं सरीखी अंतरतम में निवास करने वाली मूल्यवान नियामतों के धरातल पर पिछड़ई, जाहिलियत का शिकार बन रहे हैं। इसकी वजह यह है कि यह सनातन, जड़ता और दुर्बुद्धि के विरुद्ध संघर्ष की प्रक्रिया से न निकलकर बाजार की शक्तियों द्वारा अपने लाभ के लिए निमित्त की गई नियंत्रित आधुनिकता है जो मूलतः भेड़चाल और फैशन है और भूमंडलीकरण की कोख से निकला उपभोक्तावाद जिसका शिल्पकार है। सच्ची आधुनिकता वह है जो वर्तमान को पूर्व की तुलना में अधिक उदार, वैज्ञानिक दृष्टिसंपन्न, लोकतांत्रिक और मानवीय ऊष्मा से भरपूर बनाए; हमारे समकाल में ऐसा घटित होने की जगह चक्का उल्टा घूम रहा है। संभवतः आधुनिकता के प्रस्थान लक्षणों में एक यह है कि परस्पर भिन्न धर्म, लिंग, जाति, रंग, नस्ल के लोग साथ संग रहते हुए अन्य का सम्मान करें। यही तत्व इन दिनों सबसे ज्यादा कुचला जा रहा है। आज अधिसंख्य लोग बहुमत शक्ति के घमंड में अपने धर्म, खानपान, रिवाज, मान्यताओं, विश्वासों से इतर जीवन जीने वालों को कुचल देने का दंडाधिकार दिखा रहे हैं। आज तो आलम यह है कि एक दो दस बीस नहीं सड़क सड़क मोहल्ले मोहल्ले में खाप पंचायतों जैसी संरचनाएं आकार लेती दिखाई दे रही हैं। खाप पंचायतें फिर भी अभिनटन के तौर पर ही सही, सुनवाई वगैरह करती हैं, यहां पर तो सीधे सजा सुनाई नहीं बल्कि दे दी जा रही है। ध्यान दें कि भारत में नब्बे के दशक की शुरुआत में जब बाजार का जाल फैलता जा रहा था तो ठीक उसी वक्त रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के जरिये पुनुरुत्थानवाद का उन्माद भी विस्तार ग्रहणकर रहा था। इसे समझने की आवश्यकता है। कैसे नएपन और प्राचीनता का लिबास पहने दो एकदम विरोधी प्रवृत्तियां एक ही समय में एक साथ ताकतवर हो रही थीं। कई बार दो विरोधी एक दूसरे से दुश्मनी करके, भिड़कर दोनों ताकतवर हो जाते हैं लेकिन सहअस्तित्व के मार्फत दो विपर्ययों के शक्तिशाली बनने का यह अनूठा दृष्टांत था।
अपने देश को ही क्यों कहें, अब तो अनेक विकसित देशों में भी जिस प्रकार राष्ट्रवाद पांव पसार रहा है, वह मनुष्यता को प्यार करने वाले, उसपर आस्था जताने वाले लोगों के लिए दुःस्वप्नों की आहट है। समाजवाद को मिटाने के लिए भूमंडलीकरण को अस्त्रा बनाया गया था और मार्क्स की दुनिया के मजदूरों की एकता के बरक्स मालिकों के भाईचारे की अवधारणा को लुभावना चेहरा दिया गया था; समाजवादी देशों के लौह कपाटों के सामानांतर बताया गया कि संसार एक गांव होगा जिसमें सब रहेंगे। एक दिन होगा जब सरहदें खत्म हो चुकी होंगी। लेकिन अब उसी भूमंडलीकरण के अगुवा देश लौह द्वारों के भीतर अपना भविष्य और हिफाजत देख रहे हैं। इस प्रसंग में सर्वाधिक पीड़ाजनक और अमानवीय यह है कि भारत हो या अमेरिका या फ्रांस, नागरिकों, साधारण मनुष्यों की उल्लेखनीय हिस्सेदारी इन सबके समर्थन में खड़ी है। एक आक्रामक बहुसंख्यकवाद अपने से भिन्न को, बाहरी को दमित करने, बेदखल करने को राष्ट्रभक्ति की सच्ची गतिविधि मान रहा है। जाहिर है इतिहास की इतनी बड़ी दुर्घटना घटी है तो इसके एक नहीं अनेक कारण होंगे जिन्हें इसलिए भी तलाशा जाना चाहिए क्योंकि उनसे टकराए बगैर दुनिया को बचाया नहीं जा सकता।
साहित्य की बस्ती के बाशिंदे होने के नाते हमें इस वजह की ओर भी ध्यान देना होगा कि उपभोक्तावाद ने ऐसी संस्कृति, ऐसे समाज को गढ़ा और उसे प्रसारित तथा सुदृढ़ किया जिसमें लोगों की यह सोच बनने लगी कि जीवन का अर्थ केवल अपना या अधिक से अधिक अपने परिवार का आनंद, मौज मस्ती है। इसके लिए उपभोक्ता वस्तुएं बुनियादी तत्व हैं जिन्हें आर्थिक संपन्नता द्वारा हासिल किया जाता है। यह भी कि यह संपन्नता अपने आप में इतनी आराध्य, अपरिहार्य, मनुष्योचित है कि नीति अनीति से कोई सरोकार नहीं है। इस प्रकार नैतिक अनैतिक, सच झूठ आदि हमारे आचरण के शब्दकोश से निर्वासित होने लगे। इतना ही नहीं अमीरी के दर्शन ने उपभोक्ता के अंदर से सामाजिक बोध, दूसरे नागरिकों के अधिकारों, स्वातंत्रय के प्रति संवेदनशीलता को बुरी तरह तहसनहस किया जिसका अगला पड़ाव यह बना है कि अन्य हमको इस स्वनिर्मित तर्क से शत्राु लगने लगता है कि वह यदि न होता या हो तो उसकी संपदा हमारी मस्ती पर रंग चढ़ाने के काम आती आएगी। सब जानते ही हैं कि एक विशेष तरह की राजनीति और उसके अनुषंगी संगठन घृणा की इस आग को ज्यादा भस्मकारी बनाने के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों, मिथकों और इतिहास की गढ़ंत व्याख्याओं की आहुति देते हैं।
विडंबना है कि सभ्यता के मौजूदा अधःपतित दौर में जब उपरोक्त मनुष्यविरोधी राजनीतिक सत्ता, शासन के खिलाफ क्रोध का ज्वालामुखी फूटना चाहए था, काफी लोग उससे उम्मीद लगाये बैठे हैं। वे अपने मतदान को अपने सुखद भविष्य के लिए किया गया निवेश मान रहे हैं। कहने का अर्थ यह कि अपने लिए लिप्सा और अन्य के लिए घृणा दो तरह के फंदों में जनता की गरदन है। अतः कहा जा सकता है, जहर गहरे उतारा जा रहा है; इसलिए अबकी बार प्रतिरोध को भी अधिक धैर्य, सूझ, शक्ति की जरूरत है। निश्चय ही यह भी कहना है कि प्रतिरोध के तुरंता रूपों और समस्या के झटपट उपायों को पेश करने तथा आजमाने की उतावली से बचते हुए अधिक गहरे उतरना पड़ेगा।

पिछले और इस अंक की अवधि में हमने विख्यात पर्यावरणविद, चिंतक, लेखक, गांधीवादी अनुपम मिश्र को खो दिया। उनके सरीखे व्यक्तित्व की मौजूदगी विरल थी जो अब नहीं है। विख्यात दलित चिंतक और लेखक धर्मवीर का निधन भी अप्रत्याशित, अपूर्णनीय है। उनके विचारों ने हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को जिस प्रकार उल्टा पुल्टा और मरोड़ा उसका कोई दूसरा समानांतर नहीं मिलेगा। उपरोक्त अवधि में ही कहानीकार वीरेंद्र सक्सेना और विद्यालाल हमारे बीच से चले गए। इन सभी को हमारी श्रद्धांजलि।

अखिलेश

संपादकीय l अंक 35

देश के राजनीतिक सांस्कृतिक क्षेत्रा में जो परिदृश्य उपस्थित है और कमोबेश उसको जनमत का जो समर्थन प्राप्त हुआ है उसे देखते हुए प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, वामपंथी शक्तियों के मध्य एक तरह की निराशा, हताशा, क्या करें क्या न करें वाली अनिश्चयता की घेरेबंदी बहुत अस्वाभाविक नहीं है। ऐसा निस्तेज आजादी के बाद शायद पहली बार घटित हो रहा है। दूसरी और यह भी पहली बार हो रहा है कि सत्ता की खुराक पाकर दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक ताकतें बेतरह उन्माद, अहंकार, हिंसा से बेलगाम भरी हुई हैं। बेशक इनका प्रतिकार होगा। जनता, मानवाधिकार और सौहार्द को समर्पित संस्थाएं, भारत की बहुल संस्कृति में भरोसा रखने वाले राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया सोशल मीडिया का एक तबका निश्चय ही देर सबेर संघर्षशील प्रतिपक्ष की भूमिका निबाहेगा। दरअसल वर्तमान में चिंता अधिक गंभीर तथा मारक इसलिए हो गई है कि सामान्य जन का एक खासा बड़ा हिस्सा राजनीति, संस्कृति, वैचारिकी के मोर्चे पर अनुदार और मनुष्यताविरोधी सत्ता को समर्थन देता दिखाई देता है। जब लगभग तीन वर्ष पहले केंद्र में भाजपा सरकार आरूढ़ हुई तो उसकी एक मीमांसा यह हुई कि पूंजी, प्रचार, संगठन, असत्य के सहारे उसने विजय पाई और जनमत एक कपटी किंतु विशाल मायाजाल का शिकार हुआ। दिल्ली एवं बिहार के विधानसभा चुनावों के भिन्न परिणामों ने सचमुच इस विश्लेषण को मजबूत किया कि 2014 का नतीजा एक दुःस्वप्न था जो अब टूट रहा है। इस ख्याल में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव निर्णायक मोड़ सिद्ध हो सकता था मगर इसमें भाजपा की धुआंधार फतेह ने भयानक पलटवार कर दिया। 

संपादकीय अंक 35

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