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संपादकीय l अंक 42

दुनिया नियमों से संचालित होती है और अहसास कराती है कि सब कुछ निश्चितए गणितीय और गति मान है लेकिन यह भी सच है कि आकस्मि कताओं में भी बला की ताकत होती हैय वे कई बार समस्त आकलन ोंए निष्पत् तियोंए हमारे सपन ों और कार्य योजनाओं का चेहरा बदलकर रख देती हैं। दिल चस्प है कि व्यक् तिगत जीवन में आकस्मि क घटनाएं अच्छे बुरे दोनों तरह के नतीजे देने वाली होती हैंय अचानक एक क्षण में कि सी का जीवन अंधकार और विपत् तियों से घि र जाता है तो ऐसे भी दृष्टां त होते हैं कि यकायक कि सी की दुनिया का कायाकल्प हो उठता हैय उसके चारों ओर खुशीए रोशनीए उत्सा ह छा जाता है। मगर ठीक यही बात व्यक् ति से इतर समाज के बारे में ऐसे ही नहीं कही जा सकती। अमूमन देखा यही गया है कि कि सी समाजए देश या दुनिया पर जब आकस्मि कता के पैर पड़ते हैं तो अक्स र दुखांत ही प्रकट होता है। हां यह जरूर है कि व्यक् ति के ठि काने पर जहां वह सचमुच में अकस्मा त आ जाती हैए सामूहि क पटल पर वह अकस्मा त सी दि खती हुई भी वस्तु तः वैसी होती नहीं। वह अचानक प्रकट भले होती हो मगर अपन पन े आगमन की वजहें वह पहले से तैयार करती चलती है। इसीलिए सामाजि क दुर्घ टनाएं रोड एक्सि डेंट जैसी नहीं होती हैं कि राहगीर को पीछे से आते वाहन ने धक्का मारा और लीला खत्म । वे संकेत करती हैंए यह अलग है कि लोग उन संकेतों की अनदेखी करते हैं और भारी तबाही की चपेट में आ जाते हैं। आधा साल से अधि क का समय बीत चुका हैए हमारा देश बल्कि संसार कोरोना की महामारी से घि रा हुआ है। 

संपादकीय अंक 42

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