Visitors

77584
All_DaysAll_Days77584
 
अंक 33

अंक 32

अंक 31

अंक 30

अंक 29

अंक 28

अंक 27

अंक 26 

अंक 25 

संपादकीय l अंक 33

वैसे तो परिवर्तन अपरिहार्य और मोहक माना जाता है किंतु 16 मई, 2014 के बाद से हमारे देश में परिवर्तन का जैसा नकारात्मक और विकर्षक रूप प्रकट हुआ है और वह जिस तरह निरंतर हीनतर होता जा रहा है उसकी दूसरी नजीर कम से कम हिंदुस्तान के आधुनिक इतिहास में नहीं मिलेगी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, नरेन्द्र मोदी और भाजपा की त्रिकोण ताकतों ने सम्मिलित रूप से जिस यथार्थ को निर्मित एवं प्रतिष्ठित करने का अभियान चलाया है उससे हर नागरिक को फिक्रमंद होने की जरूरत है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि हमारे नागरिक विश्व में जो लेखक, कलाकार, संस्कृतिकर्मी हैं उनके सामने तो जीवन मरण की चुनौती दरपेश हो गई है। क्योंकि जैसा प्रेमचंद ने कहा था कि ‘सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है, इसलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल के जानवरों पर रौब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है।’ संकट प्रेमचंद के समय से ज्यादा सांद्र तथा विकट इसलिए हो चुका है क्योंकि मौजूदा दौर में केंद्रीय राज्यशक्ति कई ऐसे हथियारों से मार कर रही है जिनके विरुद्ध प्रायः हर संवेदनशील और विचारशील रहता ही है और लेखकगण जिनके खिलाफ सृजन करते हैं। उपरोक्त राज्यशक्ति समर्थित और समर्थक संस्थाएं एक तरफ अति आधुनिक समाज बनाने का ख्वाब दिखाकर क्रोनी कैपिटलिज्म को देश की जनता तथा उसके संसाधनों को लूटने का निर्विघ्न अवसर दे रही हैं तो दूसरी तरफ हमारे वर्तमान को अति प्राचीन बर्बर समाज में बदलकर मानवीय उपलब्धियों को नेस्तनाबूत कर देना चाहती हैं।

आगे

tapas sarkar maintain this site
driving lessons edinburgh